प्रकाशज्ञानजननाज्जनः कर्ता जडे कथम् ।
जडेन व्यज्यते नापि चैतन्यमजडात्मकम् ॥१३॥
prakāśajñānajananājjanaḥ kartā jaḍe katham |
jaḍena vyajyate nāpi caitanyamajaḍātmakam
प्रकाश-रूप ज्ञान को उत्पन्न करने के कारण ही व्यक्ति कर्ता (कहलाता) है; जड़ में कर्तृत्व कैसे (हो)? और न ही अजड़-स्वरूप चैतन्य जड़ के द्वारा व्यंजित (प्रकट) होता है (— अतः जहाँ कर्तृत्व है वहाँ चित् है)।