The Vision of Śiva· 5.13 / 110

The Vision of Śiva5.13

5.13
प्रकाशज्ञानजननाज्जनः कर्ता जडे कथम् । जडेन व्यज्यते नापि चैतन्यमजडात्मकम् ॥१३॥
prakāśajñānajananājjanaḥ kartā jaḍe katham | jaḍena vyajyate nāpi caitanyamajaḍātmakam
— प्रकाश-रूप ज्ञान को उत्पन्न करने के कारण ; — व्यक्ति ; — कर्ता ; — जड़ में ; — कैसे ; — जड़ के द्वारा ; — व्यंजित (प्रकट) होता ; — न ही ; — चैतन्य ; — अजड़-स्वरूप

प्रकाश-रूप ज्ञान को उत्पन्न करने के कारण ही व्यक्ति कर्ता (कहलाता) है; जड़ में कर्तृत्व कैसे (हो)? और न ही अजड़-स्वरूप चैतन्य जड़ के द्वारा व्यंजित (प्रकट) होता है (— अतः जहाँ कर्तृत्व है वहाँ चित् है)।