चेतनेच्छावशाद्बाह्यसम्पत्तेरजडः कथम् ।
तिष्ठत्यादिक्रियायां हि कर्तृत्वं न जडो भवेत् ॥१४॥
cetanecchāvaśādbāhyasampatterajaḍaḥ katham |
tiṣṭhatyādikriyāyāṃ hi kartṛtvaṃ na jaḍo bhavet
चेतन-इच्छा के वश से ही बाह्य (कार्य की) सम्पत्ति (निष्पत्ति) होने के कारण, (कर्ता) अजड़ (कैसे न हो)? क्योंकि 'ठहरना' आदि क्रिया में कर्तृत्व (है), और जड़ कर्ता नहीं हो सकता।