The Vision of Śiva· 5.14 / 110

The Vision of Śiva5.14

5.14
चेतनेच्छावशाद्बाह्यसम्पत्तेरजडः कथम् । तिष्ठत्यादिक्रियायां हि कर्तृत्वं न जडो भवेत् ॥१४॥
cetanecchāvaśādbāhyasampatterajaḍaḥ katham | tiṣṭhatyādikriyāyāṃ hi kartṛtvaṃ na jaḍo bhavet
— चेतन-इच्छा के वश से ; — बाह्य (कार्य की) सम्पत्ति (निष्पत्ति) से ; — अजड़ ; — कैसे ; — 'ठहरना' आदि क्रिया में ; — क्योंकि ; — कर्तृत्व ; — नहीं ; — जड़ ; — हो सके

चेतन-इच्छा के वश से ही बाह्य (कार्य की) सम्पत्ति (निष्पत्ति) होने के कारण, (कर्ता) अजड़ (कैसे न हो)? क्योंकि 'ठहरना' आदि क्रिया में कर्तृत्व (है), और जड़ कर्ता नहीं हो सकता।