नैवं घटस्य चैतन्यमस्ति ज्ञानात् स्वकर्मणि ।
नाज्ञात्वा कर्तुमिष्येत तथाचिदवबोधनात् ॥१२॥
naivaṃ ghaṭasya caitanyamasti jñānāt svakarmaṇi |
nājñātvā kartumiṣyeta tathācidavabodhanāt
ऐसा नहीं: घट का भी चैतन्य है, क्योंकि वह अपने कर्म में ज्ञान (रखता है); क्योंकि बिना जाने (कुछ) करना सम्भव नहीं माना जाता, और (इसलिए भी कि) उसी प्रकार (तथाकथित) जड़ के बोध (ज्ञान) में (भी चित् प्रकट होती है)।