The Vision of Śiva· 5.12 / 110

The Vision of Śiva5.12

5.12
नैवं घटस्य चैतन्यमस्ति ज्ञानात् स्वकर्मणि । नाज्ञात्वा कर्तुमिष्येत तथाचिदवबोधनात् ॥१२॥
naivaṃ ghaṭasya caitanyamasti jñānāt svakarmaṇi | nājñātvā kartumiṣyeta tathācidavabodhanāt
— ऐसा नहीं ; — घट का ; — चैतन्य ; — है ; — ज्ञान के कारण ; — अपने कर्म में ; — बिना जाने नहीं ; — करना ; — सम्भव माना जाता ; — उसी प्रकार ; — जड़ के बोध (ज्ञान) में भी

ऐसा नहीं: घट का भी चैतन्य है, क्योंकि वह अपने कर्म में ज्ञान (रखता है); क्योंकि बिना जाने (कुछ) करना सम्भव नहीं माना जाता, और (इसलिए भी कि) उसी प्रकार (तथाकथित) जड़ के बोध (ज्ञान) में (भी चित् प्रकट होती है)।