The Vision of Śiva· 5.109 / 110

The Vision of Śiva5.109

5.109
नानाभावैः स्वमात्मानं जानन्नास्ते स्वयं शिवः । चिद्व्यक्तिरूपकं नानाभेदभिन्नमनन्तकम् ॥१०९॥
nānābhāvaiḥ svamātmānaṃ jānannāste svayaṃ śivaḥ | cidvyaktirūpakaṃ nānābhedabhinnamanantakam
— नाना भावों के द्वारा ; — अपने आत्मा को ; — जानता हुआ ; — स्थित रहता है ; — स्वयं शिव ; — जिसका रूप चित् की अभिव्यक्ति ; — नाना भेदों से भिन्न ; — अनन्त

नाना भावों के द्वारा अपने ही आत्मा को जानता हुआ स्वयं शिव (ही) स्थित रहता है — (वह आत्मा) जिसका रूप चित् की अभिव्यक्ति है, नाना भेदों से भिन्न (किया हुआ), (फिर भी) अनन्त (और एक)।