नानाभावैः स्वमात्मानं जानन्नास्ते स्वयं शिवः ।
चिद्व्यक्तिरूपकं नानाभेदभिन्नमनन्तकम् ॥१०९॥
nānābhāvaiḥ svamātmānaṃ jānannāste svayaṃ śivaḥ |
cidvyaktirūpakaṃ nānābhedabhinnamanantakam
नाना भावों के द्वारा अपने ही आत्मा को जानता हुआ स्वयं शिव (ही) स्थित रहता है — (वह आत्मा) जिसका रूप चित् की अभिव्यक्ति है, नाना भेदों से भिन्न (किया हुआ), (फिर भी) अनन्त (और एक)।