The Vision of Śiva· 5.108 / 110

The Vision of Śiva5.108

5.108
सर्वस्य सर्वमस्तीह नानाभावात्मरूपकैः । मद्रूपत्वं घटस्यास्ति ममास्ति गह्टरूपता ॥१०८॥
sarvasya sarvamastīha nānābhāvātmarūpakaiḥ | madrūpatvaṃ ghaṭasyāsti mamāsti gahṭarūpatā
— सबका ; — सब ; — है ; — यहाँ ; — नाना भावों के आत्म-रूपों के द्वारा ; — मेरा-रूप होना ; — घट का ; — है ; — मेरा ; — है ; — घट-रूप होना

यहाँ सबका सब (कुछ) है, नाना भावों के आत्म-रूपों के द्वारा; घट का मेरा-रूप होना है, और मेरा घट-रूप होना है।