The Vision of Śiva· 5.104 / 110

The Vision of Śiva5.104

5.104
तत्तद्रूढिवशाद्वापि सर्वज्ञत्वप्रवर्तनात् । सर्वे सर्वात्मभावेन सर्वज्ञा वा व्यवस्थिताः ॥१०४॥
tattadrūḍhivaśādvāpi sarvajñatvapravartanāt | sarve sarvātmabhāvena sarvajñā vā vyavasthitāḥ
— उस-उस रूढ़ (प्रतिष्ठित योग्यता) के वश से भी ; — सर्वज्ञत्व के प्रवर्तन से ; — सब ; — सर्व-आत्म-भाव से ; — सर्वज्ञ ; — निश्चय ही ; — अथवा ; — व्यवस्थित

अथवा उस-उस रूढ़ (प्रतिष्ठित योग्यता) के वश से भी, सर्वज्ञत्व के प्रवर्तन से — सब सर्व-आत्म-भाव से (अर्थात् प्रत्येक सब का आत्मा होने से) सर्वज्ञ रूप में व्यवस्थित हैं।