तत्तद्रूढिवशाद्वापि सर्वज्ञत्वप्रवर्तनात् ।
सर्वे सर्वात्मभावेन सर्वज्ञा वा व्यवस्थिताः ॥१०४॥
tattadrūḍhivaśādvāpi sarvajñatvapravartanāt |
sarve sarvātmabhāvena sarvajñā vā vyavasthitāḥ
अथवा उस-उस रूढ़ (प्रतिष्ठित योग्यता) के वश से भी, सर्वज्ञत्व के प्रवर्तन से — सब सर्व-आत्म-भाव से (अर्थात् प्रत्येक सब का आत्मा होने से) सर्वज्ञ रूप में व्यवस्थित हैं।