The Vision of Śiva· 5.103 / 110

The Vision of Śiva5.103

5.103
सर्वभावग्रहणतायोग्यत्वाद्वा क्रमस्थितेः । प्रत्यक्षाद्यैरुपायैर्वा निरुपायतयापिवा ॥१०३॥
sarvabhāvagrahaṇatāyogyatvādvā kramasthiteḥ | pratyakṣādyairupāyairvā nirupāyatayāpivā
— समस्त भावों के ग्रहण की ; — योग्यता के कारण ; — अथवा ; — क्रम से स्थित होने के कारण ; — प्रत्यक्ष आदि उपायों से ; — अथवा ; — बिना उपाय के ; — या भी

अथवा (सब सर्वज्ञ हैं) समस्त भावों के ग्रहण की योग्यता के कारण — चाहे (वह योग्यता) क्रम से स्थित हो, प्रत्यक्ष आदि उपायों से (व्यवहृत हो), अथवा बिना किसी उपाय के भी।