सर्वभावग्रहणतायोग्यत्वाद्वा क्रमस्थितेः ।
प्रत्यक्षाद्यैरुपायैर्वा निरुपायतयापिवा ॥१०३॥
sarvabhāvagrahaṇatāyogyatvādvā kramasthiteḥ |
pratyakṣādyairupāyairvā nirupāyatayāpivā
अथवा (सब सर्वज्ञ हैं) समस्त भावों के ग्रहण की योग्यता के कारण — चाहे (वह योग्यता) क्रम से स्थित हो, प्रत्यक्ष आदि उपायों से (व्यवहृत हो), अथवा बिना किसी उपाय के भी।