The Vision of Śiva· 5.105 / 110

The Vision of Śiva5.105

5.105
सर्वे भावाः स्वमात्मानं जानन्तः सर्वतः स्थिताः । मदात्मना घटो वेत्ति वेद्म्यहं वा घटात्मना ॥१०५॥
sarve bhāvāḥ svamātmānaṃ jānantaḥ sarvataḥ sthitāḥ | madātmanā ghaṭo vetti vedmyahaṃ vā ghaṭātmanā
— समस्त भाव ; — अपने आत्मा को ; — जानते हुए ; — सर्वत्र ; — स्थित ; — मेरे आत्मा से ; — घट ; — जानता है ; — मैं जानता हूँ ; — अथवा ; — घट के आत्मा से

समस्त भाव अपने आत्मा को जानते हुए सर्वत्र स्थित हैं; घट मेरे आत्मा से जानता है, अथवा मैं घट के आत्मा से जानता हूँ (— क्योंकि प्रत्येक में ज्ञाता आत्मा एक शिव ही है)।