तस्मादेवंविधेऽर्थेऽपि युक्तता स्यादिहैक्यतः ।
तथात्मेच्छावशान्नाक्षग्रामे चेष्टोपपद्यते ॥९९॥
tasmādevaṃvidhe'rthe'pi yuktatā syādihaikyataḥ |
tathātmecchāvaśānnākṣagrāme ceṣṭopapadyate
इसलिए इस प्रकार के विषय में भी यहाँ एकता से ही युक्तता (संगति) होगी; और इसी प्रकार आत्मा की इच्छा के वश के बिना अक्ष-ग्राम (इन्द्रिय-समूह) में चेष्टा (समन्वित व्यापार) उपपन्न नहीं होती।