मूर्तचोदकवैकल्यान्मनश्चेत्प्रेर्यतास्य नो ।
एकत्वे पुनरीदृक् स्यात्सर्वत्रैव हि युक्तता ॥१००॥
mūrtacodakavaikalyānmanaścetpreryatāsya no |
ekatve punarīdṛk syātsarvatraiva hi yuktatā
यदि (आक्षेप करो कि) मूर्त प्रेरक के अभाव से मन की प्रेरणा नहीं (हो सकती) — (तो उत्तर:) इसके विपरीत, (चित् के) एकत्व में ऐसी (संगति) सर्वत्र ही निश्चय होगी।