The Vision of Śiva· 4.100 / 124

The Vision of Śiva4.100

4.100
मूर्तचोदकवैकल्यान्मनश्चेत्प्रेर्यतास्य नो । एकत्वे पुनरीदृक् स्यात्सर्वत्रैव हि युक्तता ॥१००॥
mūrtacodakavaikalyānmanaścetpreryatāsya no | ekatve punarīdṛk syātsarvatraiva hi yuktatā
— मूर्त प्रेरक के अभाव से ; — मन ; — यदि ; — प्रेरणा ; — इसकी ; — नहीं (सम्भव) ; — एकत्व में ; — इसके विपरीत ; — ऐसी ; — होगी ; — सर्वत्र ही ; — निश्चय ; — संगति

यदि (आक्षेप करो कि) मूर्त प्रेरक के अभाव से मन की प्रेरणा नहीं (हो सकती) — (तो उत्तर:) इसके विपरीत, (चित् के) एकत्व में ऐसी (संगति) सर्वत्र ही निश्चय होगी।