नचापि भेदे भावानां ग्रहणं ज्ञानमेव वा ।
संयोगेनोपपद्येत यदि दृष्ट्यादिना भवेत् ॥१०१॥
nacāpi bhede bhāvānāṃ grahaṇaṃ jñānameva vā |
saṃyogenopapadyeta yadi dṛṣṭyādinā bhavet
और न ही भावों के भेद होने पर, उनका ग्रहण अथवा ज्ञान ही, (इन्द्रिय-)संयोग से उपपन्न होगा — चाहे वह दृष्टि आदि से हो।