The Vision of Śiva· 4.101 / 124

The Vision of Śiva4.101

4.101
नचापि भेदे भावानां ग्रहणं ज्ञानमेव वा । संयोगेनोपपद्येत यदि दृष्ट्यादिना भवेत् ॥१०१॥
nacāpi bhede bhāvānāṃ grahaṇaṃ jñānameva vā | saṃyogenopapadyeta yadi dṛṣṭyādinā bhavet
— और न ही ; — भेद होने पर ; — भावों के ; — ग्रहण ; — अथवा ज्ञान ही ; — संयोग से ; — उपपन्न होगा ; — यदि ; — दृष्टि आदि से ; — हो

और न ही भावों के भेद होने पर, उनका ग्रहण अथवा ज्ञान ही, (इन्द्रिय-)संयोग से उपपन्न होगा — चाहे वह दृष्टि आदि से हो।