नैवमक्षार्थसंयोगमात्रात् किं बोद्धुरुद्यमः ।
संयोगेऽन्यस्य सञ्जाते कथमन्यस्य बोद्धृता ॥१०२॥
naivamakṣārthasaṃyogamātrāt kiṃ boddhurudyamaḥ |
saṃyoge'nyasya sañjāte kathamanyasya boddhṛtā
ऐसा नहीं: अक्ष-अर्थ-संयोग (इन्द्रिय-विषय-सम्पर्क) मात्र से बोद्धा (ज्ञाता) का क्या उद्यम (होगा)? जब संयोग एक (इन्द्रिय) को हुआ, तब दूसरे (आत्मा) की बोद्धृता कैसे (हो, जब तक दोनों वस्तुतः अभिन्न न हों)?