The Vision of Śiva· 4.102 / 124

The Vision of Śiva4.102

4.102
नैवमक्षार्थसंयोगमात्रात् किं बोद्धुरुद्यमः । संयोगेऽन्यस्य सञ्जाते कथमन्यस्य बोद्धृता ॥१०२॥
naivamakṣārthasaṃyogamātrāt kiṃ boddhurudyamaḥ | saṃyoge'nyasya sañjāte kathamanyasya boddhṛtā
— ऐसा नहीं ; — अक्ष-अर्थ-संयोग मात्र से ; — क्या ; — बोद्धा (ज्ञाता) का ; — उद्यम ; — संयोग ; — दूसरे (इन्द्रिय) को ; — हुआ होने पर ; — कैसे ; — दूसरे (आत्मा) की ; — बोद्धृता

ऐसा नहीं: अक्ष-अर्थ-संयोग (इन्द्रिय-विषय-सम्पर्क) मात्र से बोद्धा (ज्ञाता) का क्या उद्यम (होगा)? जब संयोग एक (इन्द्रिय) को हुआ, तब दूसरे (आत्मा) की बोद्धृता कैसे (हो, जब तक दोनों वस्तुतः अभिन्न न हों)?