मनसोऽभिन्नकालत्वात् स्मृतिज्ञानमथोच्यते ।
प्रारब्धश्चासमाप्तश्च वर्तमानः क्रियामनु ॥१०३॥
manaso'bhinnakālatvāt smṛtijñānamathocyate |
prārabdhaścāsamāptaśca vartamānaḥ kriyāmanu
(यदि कहो कि) मन के अभिन्न-कालत्व (काल-भेद न होने) के कारण स्मृति-ज्ञान कहा जाता है — (तो विचार करो कि) आरम्भ की गई और असमाप्त क्रिया, क्रिया के अनुसार 'वर्तमान' (कहलाती है — अतः काल-एकता ही स्मृति का आधार है)।