The Vision of Śiva· 4.103 / 124

The Vision of Śiva4.103

4.103
मनसोऽभिन्नकालत्वात् स्मृतिज्ञानमथोच्यते । प्रारब्धश्चासमाप्तश्च वर्तमानः क्रियामनु ॥१०३॥
manaso'bhinnakālatvāt smṛtijñānamathocyate | prārabdhaścāsamāptaśca vartamānaḥ kriyāmanu
— मन के ; — अभिन्न-कालत्व के कारण ; — स्मृति-ज्ञान ; — फिर ; — कहा जाता है ; — आरम्भ की गई ; — और असमाप्त ; — वर्तमान ; — क्रिया के अनुसार

(यदि कहो कि) मन के अभिन्न-कालत्व (काल-भेद न होने) के कारण स्मृति-ज्ञान कहा जाता है — (तो विचार करो कि) आरम्भ की गई और असमाप्त क्रिया, क्रिया के अनुसार 'वर्तमान' (कहलाती है — अतः काल-एकता ही स्मृति का आधार है)।