क्षणिकत्वेन शब्दानामनभिव्यक्तितोऽपिवा ।
स्फोटाभिव्यंग्यपक्षे तु तत्रापि क्रमता कथम् ॥९७॥
kṣaṇikatvena śabdānāmanabhivyaktito'pivā |
sphoṭābhivyaṃgyapakṣe tu tatrāpi kramatā katham
चाहे शब्दों के क्षणिकत्व के कारण, अथवा (उनके एक साथ) अनभिव्यक्ति के कारण — और स्फोट के (वर्णों द्वारा) अभिव्यंग्य होने के पक्ष में भी, वहाँ क्रमता (अर्थ-बोध में क्रम) कैसे (हो, एकीकरण-चित् के बिना)?