ततोऽप्येतच्छिवात्मत्वं भावानामुपपद्यते ।
तथार्थावगतिर्वाक्यात्पदाद्वा नोपपद्यते ॥९६॥
tato'pyetacchivātmatvaṃ bhāvānāmupapadyate |
tathārthāvagatirvākyātpadādvā nopapadyate
इससे भी भावों का यह शिवात्मत्व सिद्ध होता है; इसी प्रकार वाक्य से या पद से अर्थ का अवगम भी (एकीकरणकारी चित् के बिना) उपपन्न नहीं होता।