The Vision of Śiva· 4.91 / 124

The Vision of Śiva4.91

4.91
सोऽप्यन्यथा प्रदर्श्येताक्षयतो रागद्वेषयोः । पित्रादेरप्यसत्यत्वं तत्रान्यत्र न निश्चयः ॥९१॥
so'pyanyathā pradarśyetākṣayato rāgadveṣayoḥ | pitrāderapyasatyatvaṃ tatrānyatra na niścayaḥ
— वह भी ; — अन्यथा ; — प्रदर्शित कर सकता है ; — अक्षय (न मिटने) के कारण ; — राग-द्वेष के ; — पिता आदि का भी ; — असत्यत्व ; — तब ; — कहीं भी ; — निश्चय नहीं

वह भी राग-द्वेष के अक्षय (न मिटने) के कारण (वस्तु को) अन्यथा प्रदर्शित कर सकता है; (और) पिता आदि का भी असत्यत्व (सम्भव होने से), तब (शब्द-प्रमाण से) कहीं भी निश्चय नहीं (होता)।