सोऽप्यन्यथा प्रदर्श्येताक्षयतो रागद्वेषयोः ।
पित्रादेरप्यसत्यत्वं तत्रान्यत्र न निश्चयः ॥९१॥
so'pyanyathā pradarśyetākṣayato rāgadveṣayoḥ |
pitrāderapyasatyatvaṃ tatrānyatra na niścayaḥ
वह भी राग-द्वेष के अक्षय (न मिटने) के कारण (वस्तु को) अन्यथा प्रदर्शित कर सकता है; (और) पिता आदि का भी असत्यत्व (सम्भव होने से), तब (शब्द-प्रमाण से) कहीं भी निश्चय नहीं (होता)।