तस्मान्न भेदे भावानां तद्ग्रहाद्यपि युज्यते ।
क्षणभंगपरामर्शादप्येतदुपपद्यते ॥९२॥
tasmānna bhede bhāvānāṃ tadgrahādyapi yujyate |
kṣaṇabhaṃgaparāmarśādapyetadupapadyate
इसलिए भावों के भेद होने पर उनका ग्रहण आदि भी संगत नहीं; और क्षण-भंग (क्षणिकता) के परामर्श से भी यही (निष्कर्ष — एकता की अनिवार्यता) सिद्ध होता है।