The Vision of Śiva· 4.90 / 124

The Vision of Śiva4.90

4.90
आप्तवाक्यादथास्तीह तत्सत्यत्वेऽदृढा मतिः । न राजते ह्ययोवक्ता सत्यभाषी कदाचन ॥९०॥
āptavākyādathāstīha tatsatyatve'dṛḍhā matiḥ | na rājate hyayovaktā satyabhāṣī kadācana
— आप्त-वाक्य (विश्वसनीय वचन) से ; — अब ; — है (प्रमा) ; — यहाँ ; — उसकी सत्यता में ; — दृढ़ नहीं बुद्धि ; — नहीं रहता (सदा) ; — क्योंकि ; — अभ्रान्त वक्ता ; — सत्यभाषी ; — सर्वदा

अब यदि (कहो कि) यहाँ आप्त-वाक्य (विश्वसनीय वचन) से (प्रमा होती है) — (तो भी) उसकी सत्यता में बुद्धि दृढ़ नहीं; क्योंकि (अन्यथा) अभ्रान्त वक्ता भी सर्वदा सत्यभाषी (होकर) नहीं रहता।