आप्तवाक्यादथास्तीह तत्सत्यत्वेऽदृढा मतिः ।
न राजते ह्ययोवक्ता सत्यभाषी कदाचन ॥९०॥
āptavākyādathāstīha tatsatyatve'dṛḍhā matiḥ |
na rājate hyayovaktā satyabhāṣī kadācana
अब यदि (कहो कि) यहाँ आप्त-वाक्य (विश्वसनीय वचन) से (प्रमा होती है) — (तो भी) उसकी सत्यता में बुद्धि दृढ़ नहीं; क्योंकि (अन्यथा) अभ्रान्त वक्ता भी सर्वदा सत्यभाषी (होकर) नहीं रहता।