यावन्न वह्निकलना न योगकलना भवेत् ।
यावद्वा योगकलना न वह्निकलनाक्षमा ॥८९॥
yāvanna vahnikalanā na yogakalanā bhavet |
yāvadvā yogakalanā na vahnikalanākṣamā
क्योंकि जब तक अग्नि का कलन (ज्ञान) न हो, तब तक योग (सम्बन्ध) का कलन नहीं होगा; और जब तक योग का कलन (न हो), तब तक (धूम-दर्शन) अग्नि के कलन में समर्थ नहीं (— यही दुष्चक्र है)।