The Vision of Śiva· 4.88 / 124

The Vision of Śiva4.88

4.88
धूमदृष्ट्याथ कल्प्येत वह्निस्तद्योगितापि च । इतरेतरदोषोऽत्र दुर्निवारः प्रसज्यते ॥८८॥
dhūmadṛṣṭyātha kalpyeta vahnistadyogitāpi ca | itaretaradoṣo'tra durnivāraḥ prasajyate
— धूम-दर्शन से ; — अब ; — कल्पित की जाए ; — अग्नि ; — और उसकी योगिता भी ; — इतरेतर (अन्योन्याश्रय) दोष ; — यहाँ ; — निवारण-कठिन ; — आ पड़ता है

अब यदि धूम-दर्शन से अग्नि और उसकी (धूम के साथ) योगिता (दोनों) एक साथ कल्पित की जाएँ — तो यहाँ इतरेतराश्रय (अन्योन्याश्रय) दोष, जिसका निवारण कठिन है, आ पड़ता है।