धूमदृष्ट्याथ कल्प्येत वह्निस्तद्योगितापि च ।
इतरेतरदोषोऽत्र दुर्निवारः प्रसज्यते ॥८८॥
dhūmadṛṣṭyātha kalpyeta vahnistadyogitāpi ca |
itaretaradoṣo'tra durnivāraḥ prasajyate
अब यदि धूम-दर्शन से अग्नि और उसकी (धूम के साथ) योगिता (दोनों) एक साथ कल्पित की जाएँ — तो यहाँ इतरेतराश्रय (अन्योन्याश्रय) दोष, जिसका निवारण कठिन है, आ पड़ता है।