तत्सम्बन्धादथोच्येत सम्बन्धे द्विष्ठता नच ।
द्विनिष्ठत्वादेकतरग्रहणान्नापि तद्ग्रहः ॥८७॥
tatsambandhādathocyeta sambandhe dviṣṭhatā naca |
dviniṣṭhatvādekataragrahaṇānnāpi tadgrahaḥ
अब यदि (कहो कि अनुमान) उन दोनों के सम्बन्ध से (होता है) — (तो) सम्बन्ध की द्विष्ठता (दो में रहना, एक के अभाव में गृहीत नहीं होती); और द्विनिष्ठ होने के कारण, एक के ही ग्रहण से उस (सम्बन्ध) का ग्रहण भी नहीं (होता)।