The Vision of Śiva· 4.87 / 124

The Vision of Śiva4.87

4.87
तत्सम्बन्धादथोच्येत सम्बन्धे द्विष्ठता नच । द्विनिष्ठत्वादेकतरग्रहणान्नापि तद्ग्रहः ॥८७॥
tatsambandhādathocyeta sambandhe dviṣṭhatā naca | dviniṣṭhatvādekataragrahaṇānnāpi tadgrahaḥ
— उन दोनों के सम्बन्ध से ; — अब यदि कहा जाए ; — सम्बन्ध में ; — द्विष्ठता (दो में रहना) ; — और नहीं ; — द्विनिष्ठ होने के कारण ; — एक के ग्रहण से ; — नहीं भी ; — उस (सम्बन्ध) का ग्रहण

अब यदि (कहो कि अनुमान) उन दोनों के सम्बन्ध से (होता है) — (तो) सम्बन्ध की द्विष्ठता (दो में रहना, एक के अभाव में गृहीत नहीं होती); और द्विनिष्ठ होने के कारण, एक के ही ग्रहण से उस (सम्बन्ध) का ग्रहण भी नहीं (होता)।