The Vision of Śiva· 4.80 / 124

The Vision of Śiva4.80

4.80
वाच्यवाचकरूपत्वे वाच्यवाचकतान्वयः । इतश्चास्ति जगत्यैक्यं प्रत्यक्षाग्रहणादपि ॥८०॥
vācyavācakarūpatve vācyavācakatānvayaḥ | itaścāsti jagatyaikyaṃ pratyakṣāgrahaṇādapi
— वाच्य-वाचक-रूप (संयुक्त) होने पर ; — वाच्य-वाचकता का अन्वय ; — और इससे ; — है ; — जगत् में ; — एकता ; — प्रत्यक्ष द्वारा (भेद के) अग्रहण से ; — भी

वाच्य-वाचक-रूप (पहले से संयुक्त) होने पर ही वाच्य-वाचकता का अन्वय (बनता है); और इससे भी जगत् में एकता है — प्रत्यक्ष द्वारा (शब्द-अर्थ में किसी वास्तविक भेद का) अग्रहण से भी।