वाच्यवाचकरूपत्वे वाच्यवाचकतान्वयः ।
इतश्चास्ति जगत्यैक्यं प्रत्यक्षाग्रहणादपि ॥८०॥
vācyavācakarūpatve vācyavācakatānvayaḥ |
itaścāsti jagatyaikyaṃ pratyakṣāgrahaṇādapi
वाच्य-वाचक-रूप (पहले से संयुक्त) होने पर ही वाच्य-वाचकता का अन्वय (बनता है); और इससे भी जगत् में एकता है — प्रत्यक्ष द्वारा (शब्द-अर्थ में किसी वास्तविक भेद का) अग्रहण से भी।