The Vision of Śiva· 4.81 / 124

The Vision of Śiva4.81

4.81
स्वलक्षणेन योगित्वाद्व्यवहारस्य सर्वतः । लोके चानुपपत्तेश्च प्रमा च व्यवहारगा ॥८१॥
svalakṣaṇena yogitvādvyavahārasya sarvataḥ | loke cānupapatteśca pramā ca vyavahāragā
— स्वलक्षण (अद्वितीय विशेष) के साथ ; — योग होने के कारण ; — व्यवहार की ; — सर्वत्र ; — लोक में ; — और ; — (अन्यथा) अनुपपत्ति के कारण ; — और ; — प्रमा (यथार्थ ज्ञान) ; — भी ; — व्यवहार-गत

(यह इसलिए कि) व्यवहार सर्वत्र स्वलक्षण (अद्वितीय विशेष) के साथ युक्त है, और (अन्यथा) लोक में (व्यवहार की) अनुपपत्ति होगी; और प्रमा (यथार्थ ज्ञान) भी व्यवहार-गत है (— ये सब अन्तर्निहित एकता पर निर्भर हैं)।