स्वलक्षणेन योगित्वाद्व्यवहारस्य सर्वतः ।
लोके चानुपपत्तेश्च प्रमा च व्यवहारगा ॥८१॥
svalakṣaṇena yogitvādvyavahārasya sarvataḥ |
loke cānupapatteśca pramā ca vyavahāragā
(यह इसलिए कि) व्यवहार सर्वत्र स्वलक्षण (अद्वितीय विशेष) के साथ युक्त है, और (अन्यथा) लोक में (व्यवहार की) अनुपपत्ति होगी; और प्रमा (यथार्थ ज्ञान) भी व्यवहार-गत है (— ये सब अन्तर्निहित एकता पर निर्भर हैं)।