The Vision of Śiva· 4.79 / 124

The Vision of Śiva4.79

4.79
वाच्यवाचकरूपश्चेत्स एष नियमः कुतः । यत्तस्य वाचकत्वं हि वाच्यत्वमपरस्य तु ॥७९॥
vācyavācakarūpaścetsa eṣa niyamaḥ kutaḥ | yattasya vācakatvaṃ hi vācyatvamaparasya tu
— वाच्य-वाचक-रूप ; — यदि ; — यह ; — नियम ; — कहाँ से ; — कि ; — इस (शब्द) का ; — वाचकत्व ; — निश्चय ही ; — वाच्यत्व ; — किन्तु दूसरे का

यदि (कहो कि) वाच्य-वाचक-रूप (नियत है) — तो यह नियम कहाँ से (आया), कि इस (शब्द) का वाचकत्व है, और दूसरे (अर्थ) का (केवल) वाच्यत्व (— इसका कोई आधार चित् से बाहर नहीं)?