वाच्यवाचकरूपश्चेत्स एष नियमः कुतः ।
यत्तस्य वाचकत्वं हि वाच्यत्वमपरस्य तु ॥७९॥
vācyavācakarūpaścetsa eṣa niyamaḥ kutaḥ |
yattasya vācakatvaṃ hi vācyatvamaparasya tu
यदि (कहो कि) वाच्य-वाचक-रूप (नियत है) — तो यह नियम कहाँ से (आया), कि इस (शब्द) का वाचकत्व है, और दूसरे (अर्थ) का (केवल) वाच्यत्व (— इसका कोई आधार चित् से बाहर नहीं)?