The Vision of Śiva· 4.78 / 124

The Vision of Śiva4.78

4.78
संयोगश्चेन्न दूरेषु मूर्तामूर्तेषु युज्यते । शब्दस्योच्चारितध्वंसान्नष्टानष्टद्वये नच ॥७८॥
saṃyogaścenna dūreṣu mūrtāmūrteṣu yujyate | śabdasyoccāritadhvaṃsānnaṣṭānaṣṭadvaye naca
— संयोग ; — यदि ; — नहीं ; — दूर-स्थित में ; — मूर्त-अमूर्त में ; — सम्भव ; — शब्द के ; — उच्चरित होते ही नष्ट होने से ; — नष्ट-अनष्ट के युगल में ; — और नहीं

और यदि (शब्द-अर्थ का वास्तविक) संयोग (मानो), तो वह दूर-स्थित, मूर्त-अमूर्त (वस्तुओं) में सम्भव नहीं; और चूँकि शब्द उच्चरित होते ही नष्ट हो जाता है, (अतः) नष्ट और अनष्ट (शब्द-अर्थ) के युगल में (संयोग) नहीं।