संयोगश्चेन्न दूरेषु मूर्तामूर्तेषु युज्यते ।
शब्दस्योच्चारितध्वंसान्नष्टानष्टद्वये नच ॥७८॥
saṃyogaścenna dūreṣu mūrtāmūrteṣu yujyate |
śabdasyoccāritadhvaṃsānnaṣṭānaṣṭadvaye naca
और यदि (शब्द-अर्थ का वास्तविक) संयोग (मानो), तो वह दूर-स्थित, मूर्त-अमूर्त (वस्तुओं) में सम्भव नहीं; और चूँकि शब्द उच्चरित होते ही नष्ट हो जाता है, (अतः) नष्ट और अनष्ट (शब्द-अर्थ) के युगल में (संयोग) नहीं।