कथं न देवदत्तस्य यज्ञदत्तवदाख्यया ।
अत्र संकेतितत्वाच्चेत् संकेतेनात्र किं कृतम् ॥७७॥
kathaṃ na devadattasya yajñadattavadākhyayā |
atra saṃketitatvāccet saṃketenātra kiṃ kṛtam
(अन्यथा) देवदत्त का (नाम) यज्ञदत्त के समान (किसी पर भी) क्यों न (लागू हो)? यदि (कहो कि) यहाँ संकेत (संकेतन) के कारण (नियम है) — तो संकेत से यहाँ क्या (वास्तविक सम्बन्ध) किया गया?