तस्मादैक्येन तत्त्वस्य सर्वं तदपि युज्यते ।
व्यतिरिक्तेन शब्देन मन्त्रेणानतिरेकिणा ॥७६॥
tasmādaikyena tattvasya sarvaṃ tadapi yujyate |
vyatiriktena śabdena mantreṇānatirekiṇā
इसलिए तत्त्व की एकता से ही यह सब भी संगत होता है — (चाहे) व्यतिरिक्त (पृथक्) शब्द से (हो), अथवा अनतिरेकी (अपृथक्) मन्त्र से (बँधने की शक्ति एक तत्त्व की ही है)।