The Vision of Śiva· 4.65 / 124

The Vision of Śiva4.65

4.65
मनसः प्रेरणं कस्मात्प्राग्ज्ञानेन विना स्थिता । सर्वैकतात एवात्र तथा सौषुप्तबोधनम् ॥६५॥
manasaḥ preraṇaṃ kasmātprāgjñānena vinā sthitā | sarvaikatāta evātra tathā sauṣuptabodhanam
— मन की ; — प्रेरणा ; — किससे ; — पहले ; — (पूर्व) ज्ञान के बिना ; — स्थित (प्रश्न) ; — सबकी एकता ; — इसी कारण ; — यहाँ ; — इसी प्रकार ; — सुषुप्ति से जागना

मन की प्रेरणा पहले से, (पूर्व) ज्ञान के बिना, किससे (हो)? (यह तो) सबकी एकता के कारण ही (सम्भव है); और इसी प्रकार यहाँ सुषुप्ति से जागना (व्याख्यायित होता है)।