मनसः प्रेरणं कस्मात्प्राग्ज्ञानेन विना स्थिता ।
सर्वैकतात एवात्र तथा सौषुप्तबोधनम् ॥६५॥
manasaḥ preraṇaṃ kasmātprāgjñānena vinā sthitā |
sarvaikatāta evātra tathā sauṣuptabodhanam
मन की प्रेरणा पहले से, (पूर्व) ज्ञान के बिना, किससे (हो)? (यह तो) सबकी एकता के कारण ही (सम्भव है); और इसी प्रकार यहाँ सुषुप्ति से जागना (व्याख्यायित होता है)।