The Vision of Śiva· 4.59 / 124

The Vision of Śiva4.59

4.59
इतोऽपि नाशो नास्त्यस्य घटस्य करणात्पुनः । नाभावप्राप्तरूपस्य करणं युज्यते पुनः ॥५९॥
ito'pi nāśo nāstyasya ghaṭasya karaṇātpunaḥ | nābhāvaprāptarūpasya karaṇaṃ yujyate punaḥ
— इससे भी ; — नाश ; — नहीं है ; — इस घट का ; — (फिर) बनाए जाने के कारण ; — फिर से ; — नहीं ; — अभाव-रूप को प्राप्त का ; — करण ; — उचित ; — फिर

इससे भी इस घट का नाश नहीं — क्योंकि वह फिर से बनाया (प्रकट किया) जा सकता है; जो (वस्तु) अभाव-रूप को प्राप्त हो चुकी, उसका फिर करण उचित नहीं (अत्यन्त असत् कभी उत्पन्न नहीं होता)।