The Vision of Śiva· 4.58 / 124

The Vision of Śiva4.58

4.58
इन्द्रियाणामसामर्थ्यमात्रमत्र विनाशिता । असावेवानभिव्यक्तिः स प्रच्छन्नस्तदा स्थितः ॥५८॥
indriyāṇāmasāmarthyamātramatra vināśitā | asāvevānabhivyaktiḥ sa pracchannastadā sthitaḥ
— इन्द्रियों की ; — असमर्थता-मात्र ; — यहाँ ; — विनाश (कहलाता है) ; — यही ; — अनभिव्यक्ति (अप्रकटन) ; — वह (वस्तु) ; — प्रच्छन्न (छिपी) ; — तब ; — स्थित

यहाँ (जिसे) विनाश (कहते हैं वह) इन्द्रियों की असमर्थता-मात्र है; यही अनभिव्यक्ति (अप्रकटन) है; और वह (वस्तु) तब प्रच्छन्न (छिपी हुई) होकर स्थित रहती है (नष्ट नहीं होती)।