इन्द्रियाणामसामर्थ्यमात्रमत्र विनाशिता ।
असावेवानभिव्यक्तिः स प्रच्छन्नस्तदा स्थितः ॥५८॥
indriyāṇāmasāmarthyamātramatra vināśitā |
asāvevānabhivyaktiḥ sa pracchannastadā sthitaḥ
यहाँ (जिसे) विनाश (कहते हैं वह) इन्द्रियों की असमर्थता-मात्र है; यही अनभिव्यक्ति (अप्रकटन) है; और वह (वस्तु) तब प्रच्छन्न (छिपी हुई) होकर स्थित रहती है (नष्ट नहीं होती)।