इतश्च सर्वशिवतावयवेभ्यो न कुत्रचित् ॥६०॥
itaśca sarvaśivatāvayavebhyo na kutracit
और इस (विचार) से सबकी शिवता (सिद्ध होती है): अवयवों से (पृथक् कोई वस्तुतः भिन्न अवयवी) कहीं नहीं (मिलता)।
और इस (विचार) से सबकी शिवता (सिद्ध होती है): अवयवों से (पृथक् कोई वस्तुतः भिन्न अवयवी) कहीं नहीं (मिलता)।