The Vision of Śiva· 4.52 / 124

The Vision of Śiva4.52

4.52
अपृथग्वा पृथक्त्वे तु पटादेः करणं न किम् । अनुपादानतैव स्यादपृथक्त्वे स एव सः ॥५२॥
apṛthagvā pṛthaktve tu paṭādeḥ karaṇaṃ na kim | anupādānataiva syādapṛthaktve sa eva saḥ
— अथवा अपृथक् ; — पृथक् होने पर ; — किन्तु ; — पट (वस्त्र) आदि का ; — करण ; — क्यों नहीं ; — अनुपादानता ही (उपादान न होना) ; — होगी ; — अपृथक् होने पर ; — वह वही (मिट्टी) ही

अथवा अपृथक्? किन्तु पृथक् होने पर, पट (वस्त्र) आदि का करण (मिट्टी से) क्यों नहीं? और (मिट्टी की) अनुपादानता ही (उपादान न होना) हो जाएगी; और अपृथक् होने पर तो वह (घट) वही (मिट्टी) ही है।