अपृथग्वा पृथक्त्वे तु पटादेः करणं न किम् ।
अनुपादानतैव स्यादपृथक्त्वे स एव सः ॥५२॥
apṛthagvā pṛthaktve tu paṭādeḥ karaṇaṃ na kim |
anupādānataiva syādapṛthaktve sa eva saḥ
अथवा अपृथक्? किन्तु पृथक् होने पर, पट (वस्त्र) आदि का करण (मिट्टी से) क्यों नहीं? और (मिट्टी की) अनुपादानता ही (उपादान न होना) हो जाएगी; और अपृथक् होने पर तो वह (घट) वही (मिट्टी) ही है।