The Vision of Śiva· 4.50 / 124

The Vision of Śiva4.50

4.50
नासंबद्धस्य करणं सत्कार्याच्चेत्स विद्यते । सन्नप्यसावसंवेद्यो व्यञ्जकस्याप्यभावतः ॥५०॥
nāsaṃbaddhasya karaṇaṃ satkāryāccetsa vidyate | sannapyasāvasaṃvedyo vyañjakasyāpyabhāvataḥ
— नहीं ; — असम्बद्ध का ; — करण ; — सत्कार्य (सिद्धान्त) से ; — यदि ; — वह ; — विद्यमान है ; — सत् होते हुए भी ; — यह (कार्य) ; — असंवेद्य (अज्ञेय) ; — व्यंजक (अभिव्यक्तिकर्ता) के भी ; — अभाव के कारण

असम्बद्ध (वस्तु) का करण नहीं (होता); और यदि सत्कार्य (सिद्धान्त) से वह (पहले से) विद्यमान है — तो सत् होते हुए भी यह (कार्य) असंवेद्य (अज्ञेय) है, क्योंकि व्यंजक (अभिव्यक्तिकर्ता) का भी अभाव है (— यही तो हम कह रहे हैं)।