नासंबद्धस्य करणं सत्कार्याच्चेत्स विद्यते ।
सन्नप्यसावसंवेद्यो व्यञ्जकस्याप्यभावतः ॥५०॥
nāsaṃbaddhasya karaṇaṃ satkāryāccetsa vidyate |
sannapyasāvasaṃvedyo vyañjakasyāpyabhāvataḥ
असम्बद्ध (वस्तु) का करण नहीं (होता); और यदि सत्कार्य (सिद्धान्त) से वह (पहले से) विद्यमान है — तो सत् होते हुए भी यह (कार्य) असंवेद्य (अज्ञेय) है, क्योंकि व्यंजक (अभिव्यक्तिकर्ता) का भी अभाव है (— यही तो हम कह रहे हैं)।