The Vision of Śiva· 4.43 / 124

The Vision of Śiva4.43

4.43
यथा सतः क्रियाव्यक्तिर्व्यक्तेः सत्त्वे तथा कृतिः । एकेनापरतुल्यत्वान्नच वाऽसत उद्भवः ॥४३॥
yathā sataḥ kriyāvyaktirvyakteḥ sattve tathā kṛtiḥ | ekenāparatulyatvānnaca vā'sata udbhavaḥ
— जैसे ; — सत् की ; — क्रिया-व्यक्ति (अभिव्यक्ति-रूप क्रिया) ; — व्यक्ति के ; — सत् होने पर ; — वैसे ही ; — कृति ; — एक (बात) में अन्य से अतुल्यता के कारण ; — और न ; — असत् का ; — उद्भव

(उत्तर:) जैसे सत् की क्रिया-व्यक्ति (अभिव्यक्ति-रूप क्रिया) है, वैसे ही व्यक्ति के (स्वयं) सत् होने पर (उसकी भी) कृति (अपेक्षित होगी — अनवस्था); क्योंकि एक बात में (स्वयं-प्रकाश की) किसी अन्य से तुल्यता नहीं; और असत् का उद्भव भी नहीं (होता)।