घटान्तरं पूर्वदृष्टमाकलययाथ चेष्टनम् ॥४४॥
ghaṭāntaraṃ pūrvadṛṣṭamākalayayātha ceṣṭanam
दूसरे, पहले देखे हुए घट को (मन में) आकलित करके (कुम्भकार) चेष्टा (प्रयत्न) करता है (अतः कार्य किसी रूप में पूर्व से ही चित् में विद्यमान है)।
दूसरे, पहले देखे हुए घट को (मन में) आकलित करके (कुम्भकार) चेष्टा (प्रयत्न) करता है (अतः कार्य किसी रूप में पूर्व से ही चित् में विद्यमान है)।