The Vision of Śiva· 4.41 / 124

The Vision of Śiva4.41

4.41
बहूनां कल्पनीयात्र नच वा व्यतिरेकतः । व्यक्तिः स्थिता पदार्थानां घटो व्यक्तोऽभिधीयते ॥४१॥
bahūnāṃ kalpanīyātra naca vā vyatirekataḥ | vyaktiḥ sthitā padārthānāṃ ghaṭo vyakto'bhidhīyate
— अनेक (अभिव्यक्तियों) की ; — कल्पनीय ; — यहाँ ; — और न ; — पृथक् रूप से ; — व्यक्ति (अभिव्यक्ति) ; — स्थित ; — पदार्थों की ; — घट ; — व्यक्त ; — कहा जाता है

यहाँ न तो अनेक (अभिव्यक्तियों) की कल्पना करनी चाहिए, और न (पदार्थों से) पृथक् रूप से पदार्थों की व्यक्ति (अभिव्यक्ति) स्थित है; (अपितु) 'घट व्यक्त है' — ऐसा कहा जाता है (व्यक्तता ही उसका स्वरूप है)।