क्रियते ह्यसती वाथ सत्याः किं नोपलब्धता ।
व्यक्त्यभावादथानन्त्यमसत्या हानिसंभवः ॥३६॥
kriyate hyasatī vātha satyāḥ kiṃ nopalabdhatā |
vyaktyabhāvādathānantyamasatyā hānisaṃbhavaḥ
क्योंकि यदि वह असत् होकर की जाती है (तो तुम्हारा ही पक्ष छूटता है); अथवा यदि अभिव्यक्ति सत् है, तो (पहले से ही) उसकी उपलब्धि क्यों नहीं? (और यदि उसकी एक और अभिव्यक्ति मानो, तो) उस अभिव्यक्ति के अभाव से, अथवा अनन्त्य (अनवस्था आती है); और असत् मानने पर (सत्कार्य-) सिद्धान्त की हानि का प्रसंग।