The Vision of Śiva· 4.37 / 124

The Vision of Śiva4.37

4.37
नैवं यस्मात्तां विहाय सर्वत्रान्यत्र सत्क्रिया ॥३७॥
naivaṃ yasmāttāṃ vihāya sarvatrānyatra satkriyā
— ऐसा नहीं ; — क्योंकि ; — उस (एक अभिव्यक्ति) को ; — छोड़कर ; — सर्वत्र अन्यत्र ; — सत् की क्रिया

ऐसा नहीं (कोई अनवस्था नहीं) — क्योंकि उस एक (स्वयं-प्रकाश अभिव्यक्ति) को छोड़कर, सर्वत्र अन्यत्र सत् की ही क्रिया (अभिव्यक्ति, न कि नई अभिव्यक्ति) होती है।