सत्कार्यं नोपपन्नं चेत्सतः किं करणेन यत् ।
अभिव्यक्तिरथास्यात्र क्रियते सापि किं सती ॥३५॥
satkāryaṃ nopapannaṃ cetsataḥ kiṃ karaṇena yat |
abhivyaktirathāsyātra kriyate sāpi kiṃ satī
(आक्षेप:) सत्कार्य (कारण में कार्य का पूर्व-अस्तित्व) उपपन्न नहीं — क्योंकि जो पहले से सत् है, उसको करण (साधन) से क्या (प्रयोजन)? (प्रति-आक्षेप:) अथवा यदि (कहो कि) यहाँ उसकी अभिव्यक्ति की जाती है, तो वह अभिव्यक्ति भी क्या सती (विद्यमान) है (या असत्)?