The Vision of Śiva· 4.31 / 124

The Vision of Śiva4.31

4.31
अमूर्ता न च वाणूनामन्तरेव प्रवेशिता । प्रतिपत्तुः कथं वेत्ति घटोऽयं प्रविभेदतः ॥३१॥
amūrtā na ca vāṇūnāmantareva praveśitā | pratipattuḥ kathaṃ vetti ghaṭo'yaṃ pravibhedataḥ
— अमूर्त (ज्ञान) ; — और नहीं ; — अणुओं के ; — भीतर ही ; — प्रविष्ट ; — प्रतिपत्ता (ज्ञाता) का ; — कैसे ; — जानता है ; — 'यह घट है' ; — पृथक् (भिन्न) रूप से

और अमूर्त (ज्ञान) (घट के) अणुओं के भीतर प्रविष्ट नहीं किया जा सकता। (तो) प्रतिपत्ता (ज्ञाता) 'यह घट है' — ऐसा भिन्न (पृथक्) रूप से कैसे जानता है?