The Vision of Śiva· 4.32 / 124

The Vision of Śiva4.32

4.32
शशशृङ्गादिके नापि स्याद्विभक्त्या समन्वयः ॥३२॥
śaśaśṛṅgādike nāpi syādvibhaktyā samanvayaḥ
— शश-शृंग (खरगोश के सींग) आदि में ; — भी नहीं ; — हो सके ; — विभक्त रूप से ; — समन्वय

शश-शृंग (खरगोश के सींग) आदि (असत् वस्तु) में भी विभक्त रूप से (पृथक् वस्तु के रूप में ज्ञान का) समन्वय नहीं हो सकता।