तस्मादवस्थितं सर्वं सत्त्वं चिद्व्यक्तियोगिता ।
यत्र यत्र तत्र तत्र सत्यत्वं विश्वरूपता ॥२९॥
tasmādavasthitaṃ sarvaṃ sattvaṃ cidvyaktiyogitā |
yatra yatra tatra tatra satyatvaṃ viśvarūpatā
इसलिए सब कुछ (सत् रूप में) अवस्थित है; (उसका) सत्त्व चित्-व्यक्ति (की अभिव्यक्ति) के साथ योग है। जहाँ-जहाँ (सत्ता है), वहाँ-वहाँ सत्यता है — (एक चित् की) विश्वरूपता।