प्रतिष्ठादेवकर्मादिध्यानादिफलयोगतः ।
सत्येऽपि न फलं दृष्टं क्वचिदज्ञानिसेवितात् ॥२८॥
pratiṣṭhādevakarmādidhyānādiphalayogataḥ |
satye'pi na phalaṃ dṛṣṭaṃ kvacidajñānisevitāt
प्रतिष्ठा, देव-कर्म आदि, ध्यान आदि के फल के योग से (देखा जाता है कि) — (पूज्य वस्तु) सत्य होने पर भी, अज्ञानी द्वारा सेवित (अनुष्ठान) से कहीं फल नहीं देखा गया।