The Vision of Śiva· 4.28 / 124

The Vision of Śiva4.28

4.28
प्रतिष्ठादेवकर्मादिध्यानादिफलयोगतः । सत्येऽपि न फलं दृष्टं क्वचिदज्ञानिसेवितात् ॥२८॥
pratiṣṭhādevakarmādidhyānādiphalayogataḥ | satye'pi na phalaṃ dṛṣṭaṃ kvacidajñānisevitāt
— प्रतिष्ठा, देव-कर्म आदि, ध्यान आदि के फल के योग से ; — (पूज्य वस्तु) सत्य होने पर भी ; — नहीं ; — फल ; — देखा गया ; — कहीं ; — अज्ञानी द्वारा सेवित (अनुष्ठान) से

प्रतिष्ठा, देव-कर्म आदि, ध्यान आदि के फल के योग से (देखा जाता है कि) — (पूज्य वस्तु) सत्य होने पर भी, अज्ञानी द्वारा सेवित (अनुष्ठान) से कहीं फल नहीं देखा गया।