The Vision of Śiva· 4.119 / 124

The Vision of Śiva4.119

4.119
यादृग्दृष्टं दृष्टता स्यादथवा ज्ञानमेव तत् । दृष्टस्मरणयोरैक्ये स्थिते तदुपपद्यते ॥११९॥
yādṛgdṛṣṭaṃ dṛṣṭatā syādathavā jñānameva tat | dṛṣṭasmaraṇayoraikye sthite tadupapadyate
— जैसी देखी गई ; — दृष्टता (देखे-जाने का भाव) ; — होगी ; — अथवा ; — (केवल वर्तमान) ज्ञान ही ; — वह ; — दृष्ट-स्मरण की ; — एकता के ; — स्थित होने पर ; — वह उपपन्न होती है

(स्मृति में) जैसी (वस्तु) देखी गई थी, वैसी ही दृष्टता (देखे-जाने का भाव) होगी — अथवा वह (केवल वर्तमान) ज्ञान ही है; (किन्तु) दृष्ट और स्मरण की एकता के स्थित होने पर ही वह (स्मृति) उपपन्न होती है।