यादृग्दृष्टं दृष्टता स्यादथवा ज्ञानमेव तत् ।
दृष्टस्मरणयोरैक्ये स्थिते तदुपपद्यते ॥११९॥
yādṛgdṛṣṭaṃ dṛṣṭatā syādathavā jñānameva tat |
dṛṣṭasmaraṇayoraikye sthite tadupapadyate
(स्मृति में) जैसी (वस्तु) देखी गई थी, वैसी ही दृष्टता (देखे-जाने का भाव) होगी — अथवा वह (केवल वर्तमान) ज्ञान ही है; (किन्तु) दृष्ट और स्मरण की एकता के स्थित होने पर ही वह (स्मृति) उपपन्न होती है।