The Vision of Śiva· 4.118 / 124

The Vision of Śiva4.118

4.118
तस्माज्ज्ञेयं समग्रैक्यवस्तु शैवं व्यवस्थितम् । तथा स्मरणयोगाच्च स्मर्यते किं तथाविधम् ॥११८॥
tasmājjñeyaṃ samagraikyavastu śaivaṃ vyavasthitam | tathā smaraṇayogācca smaryate kiṃ tathāvidham
— इसलिए ; — ज्ञातव्य ; — समग्र-एकत्व-रूप वस्तु ; — शैव (शिव-स्वरूप) ; — व्यवस्थित ; — इसी प्रकार ; — स्मरण के योग से भी ; — स्मर्यमाण होता है ; — क्या वैसी ही प्रकार की

इसलिए यह ज्ञातव्य है कि समग्र-एकत्व-रूप वस्तु शैव (शिव-स्वरूप) रूप में व्यवस्थित है; और इसी प्रकार स्मरण के योग से भी (यही सिद्ध होता है) — क्योंकि क्या स्मर्यमाण (वस्तु, पूर्व-दृष्ट के) समान ही प्रकार की (होती है)?