अज्ञातेऽमुत्र याहीति प्रेर्यते केन मानसम् ।
प्रेर्यप्रेरणतत्कर्तृद्वयैक्यादुपपद्यते ॥११७॥
ajñāte'mutra yāhīti preryate kena mānasam |
preryapreraṇatatkartṛdvayaikyādupapadyate
अज्ञात (अर्थ) के विषय में 'वहाँ जाओ' — ऐसा कहकर मानस (मन) किसके द्वारा प्रेरित किया जाए (ऐसा आदेश किसको बोधगम्य हो)? (यह तो केवल) प्रेर्य, प्रेरण और उसके कर्ता — इन (तीनों) की एकता से ही उपपन्न होता है।