The Vision of Śiva· 4.117 / 124

The Vision of Śiva4.117

4.117
अज्ञातेऽमुत्र याहीति प्रेर्यते केन मानसम् । प्रेर्यप्रेरणतत्कर्तृद्वयैक्यादुपपद्यते ॥११७॥
ajñāte'mutra yāhīti preryate kena mānasam | preryapreraṇatatkartṛdvayaikyādupapadyate
— अज्ञात (अर्थ) के विषय में ; — 'वहाँ' ; — 'जाओ' ; — ऐसा ; — प्रेरित किया जाए ; — किसके द्वारा ; — मानस (मन) ; — प्रेर्य-प्रेरण-कर्ता इन (तीनों) की एकता से ; — उपपन्न होता है

अज्ञात (अर्थ) के विषय में 'वहाँ जाओ' — ऐसा कहकर मानस (मन) किसके द्वारा प्रेरित किया जाए (ऐसा आदेश किसको बोधगम्य हो)? (यह तो केवल) प्रेर्य, प्रेरण और उसके कर्ता — इन (तीनों) की एकता से ही उपपन्न होता है।