The Vision of Śiva· 4.116 / 124

The Vision of Śiva4.116

4.116
किमात्मप्रेरणेनात्र ज्ञातेऽज्ञातेऽथवा बहिः । ज्ञाते तु ज्ञानरूपत्वात् प्रेरणं केन हेतुना ॥११६॥
kimātmapreraṇenātra jñāte'jñāte'thavā bahiḥ | jñāte tu jñānarūpatvāt preraṇaṃ kena hetunā
— आत्मा की प्रेरणा से क्या ; — यहाँ ; — ज्ञात होने पर ; — अज्ञात होने पर ; — अथवा ; — बाह्य (होने पर) ; — ज्ञात होने पर तो ; — ज्ञान-रूप होने के कारण ; — प्रेरणा ; — किस हेतु से

यहाँ आत्मा की प्रेरणा से क्या (प्रयोजन) — (अर्थ के) ज्ञात होने पर, अथवा अज्ञात होने पर, अथवा बाह्य (होने पर)? ज्ञात होने पर तो, चूँकि (वह तब) ज्ञान-रूप ही है, किस हेतु से प्रेरणा (की जाए)?