किमात्मप्रेरणेनात्र ज्ञातेऽज्ञातेऽथवा बहिः ।
ज्ञाते तु ज्ञानरूपत्वात् प्रेरणं केन हेतुना ॥११६॥
kimātmapreraṇenātra jñāte'jñāte'thavā bahiḥ |
jñāte tu jñānarūpatvāt preraṇaṃ kena hetunā
यहाँ आत्मा की प्रेरणा से क्या (प्रयोजन) — (अर्थ के) ज्ञात होने पर, अथवा अज्ञात होने पर, अथवा बाह्य (होने पर)? ज्ञात होने पर तो, चूँकि (वह तब) ज्ञान-रूप ही है, किस हेतु से प्रेरणा (की जाए)?