मनसा किं किमक्षेण तेन चेत्तत्परम्परा ।
एवं तदन्धपारम्पर्यत्वरूपमिदं स्फुटम् ॥११५॥
manasā kiṃ kimakṣeṇa tena cettatparamparā |
evaṃ tadandhapāramparyatvarūpamidaṃ sphuṭam
मन से क्या (प्रयोजन), अक्ष (इन्द्रिय) से क्या? यदि उस (एक करण) से ही (ज्ञान हो), तो उन (करणों) की परम्परा (अनवस्था) (आ पड़ेगी); इस प्रकार यह (विरोधी मत) स्पष्टतः अन्धों की परम्परा (अन्धा अन्धे को राह दिखाने) रूप है (जबकि देखने वाली तो केवल चित् है)।