चैतन्येनाप्यमूर्तेन मिश्रतान्यस्य कीदृशी ।
किं स्वयं तत्प्रमेयत्वमस्य चेदतिरेकतः ॥११४॥
caitanyenāpyamūrtena miśratānyasya kīdṛśī |
kiṃ svayaṃ tatprameyatvamasya cedatirekataḥ
अमूर्त चैतन्य के साथ भी दूसरे (अर्थ) का कैसा मिश्रण (हो सकता है)? क्या उसका (अर्थ का) प्रमेयत्व (ज्ञेयता) स्वयं (का है), अथवा इस (चैतन्य) का — यदि (इसे अर्थ की) अतिरिक्तता (पृथक्ता) से (मानो, तो कोई मिश्रण सम्भव ही नहीं)?