The Vision of Śiva· 4.120 / 124

The Vision of Śiva4.120

4.120
तथा सा प्रत्यभिज्ञानात्स एवायमिति स्थितिः । युज्यते कथमत्रैव ज्ञानयोः कालभिन्नयोः ॥१२०॥
tathā sā pratyabhijñānātsa evāyamiti sthitiḥ | yujyate kathamatraiva jñānayoḥ kālabhinnayoḥ
— इसी प्रकार ; — वह ; — प्रत्यभिज्ञान (पहचान) से ; — 'यह वही है' ; — ऐसा ; — (स्थिर) ज्ञान ; — संगत होता है ; — कैसे ; — यहीं ; — दो ज्ञानों में ; — भिन्न-काल वालों में

इसी प्रकार प्रत्यभिज्ञान (पहचान) से 'यह वही है' — यह (स्थिर) ज्ञान (होता है); भिन्न कालों वाले दो ज्ञानों में यह यहीं कैसे संगत हो (एक ज्ञाता की एकता के बिना)?